54. नज़ारे मेरे खादर के

 

 

इलाही तू चला मुझको सुहारे मेरे खादर के!

मेरे आँखों में हो हर दम् नज़ारे मेरे खादर के!!

 

तुम्हारा नाम सुनते ही तडपता चीकता हूँ मैं!

मुझे दीदार के भी हो इशारे मेरे खादर के!!

 

मेरे आका मेरे मौला मेरे शाहा मेरे सरवर्!

जमीं से आसमान तक हैं नज़ारे मेरे खादर के!!

 

जिसे कहती है दुनियाँ माहे व अन्जुम् कहक शा अखतर्!

ये एक अदना हैं जर्रे चाँद तारे मेरे खादर के!!

 

हकीकत थी मेरी जरा की लेकिन बन गया सूरज!

हुए हैं मुझमें भी रोशन सितारे मेरे खादर के!!

 

खिजरे बनकर मेरे मुर्शद ने मेरी रहनुमाई की!

मिले रस्ते में भी मुझको सहारे मेरे खादर के!!

 

रफीक आका का ऐ  दावर  कयामत् में करम होगा!

सर् महशर करूगाँ मैं नज़ारे मेरे खादर के!!

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