41. कूये नबी है जनत्

 

 

अक्से रूखे मोहम्मद दिल में बसा लिया हूँ!

नामे नबी जो आया सर् को झुका लिया हूँ!!

 

पाये नबी पे सजदा मेअराजे बन्दगी है!

मैं आस्ताने अहमद् सर पर उठा लिया हूँ!!

 

तैबा की हर गली का ज़र्रा है एक सूरज!

मैं खाक बे बहा को सुर्मा बना लिया हूँ!!

 

बागे अरम की हसरत् न खुल्द की तमन्ना!

कूये नबी है जनत् जनत् को पालिया हूँ!!

 

पुरनूर जालियों पर कुर्बान मेरी हस्ती!

अपनी हर एक नज़र में मंजर समा लिया हूँ!!

 

दीदार हो रहा है अब मुस्तफा का मुझको!

नामे रसूले अकरम् लब् पर जो ला लिया हूँ!!

 

दावर  मेरा मुकद्दर महशर में क्यों न चमके!

दब्रारे मुस्तफा में आँसु बहा लिया हूँ!!

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