बन् के रब की तू सूरत अरे आदमी!
क्यों तू सर को झुकाया भले आदमी!!
वही जात तेरी कहा अनफुसिकुम् !
वहुव मअकुम इन्ना वमा कुन्तुम!
अल्इन्सान सिर्री में है राज हम तुम !
अला सूरत खल्क आदम् में है गुम् !
बन के रब की तू सूरत अरे आदमी!
क्यों तू सर को झुकाया भले आदमी!!
कल्मा पहले जबाँ से कहना पड़ा!
जो था इकरार दिल से वो करना पड़ा!
दिल है क्या चीज उस को समझना पड़ा!
दिल है मोमिन का अर्श अल्लाह समझना पडा!
बन के रब की तू सूरत अरे आदमी!
क्यों तू सर को झुकाया भले आदमी!!
सूफी सरमद् को जिस दम् बुलाया गया!
कल्मा आधा ही पढते हो क्या माजरा!
बोले सर्मद् ना मालूम इस के सिवा!
जान दे दी मगर आगे कुछ ना कहा!
बन् के रब की तू सूरत अरे आदमी!
क्यों तू सर को झुकाया भले आदमी!!
आप अपने में था मस्त मनसूर भी!
और खुदी के नशे में था वो चूर भी!
बस अनल्हक् में था राज वो दस्तूर भी!
देखा सूली पे वो जलवाये तूर भी!
बन् के रब की तू सूरत अरे आदमी!
क्यों तू सर को झुकाया भले आदमी!!
शम्स तब्रेज था मस्त बा होश था!
कुम् बे अजनी से ना ओ फरामोश था!
वो तो वहदानियत् का ही मये नौश था!
खाल खिंचवा के बन्दा वो खामोश था!
बन् के रब की तू सूरत अरे आदमी!
क्यों तू सर को झुकाया भले आदमी!!
तू नमाजोंको करना है तन से अदा!
फिर नमाजों को तन् से जुदा क्यों किया!
है तू कल्बे हुजूरी से नाआशना!
जिस में मेअराज न हो नमाज है वो क्या!
बन के रब की तू सूरत अरे आदमी!
क्यों तू सर को झुकाया भले आदमी!!
हम शरीयत से नादाँ अलग कब हुए!
हम शरीयत तरीकत् से ले ही लिये!
ये भी तस्लीम दोनो जुदा रास्ते!
फूल बागे रफीक् से दावर चुने!