तुमको रफीक आका उठाते हैं मोमिनो!
रमजान के ये रोजे दिखाते हैं मोमिनो!!
फरमाँ हक्क है और ये कौले रसूल है!
रखते नहीं है रोजा तो ये उनकी भूल है!
सहरी के वक्त तुमको जगाते हैं मोमिनो!
तुम को रफीक आका उठाते हैं मोमिनो!!
महीने के दिन भी तीस हैं रोजे के दिन भी तीस!
देखो कुरआन मोमिनो पारे हैं पाक तीस!
एक राज हक्क ने इस में छुपाये हैं मोमिनों!
तुम को रफीक आका उठाते हैं मोमिनों!!
रोजा रखेंगे दिल से तो हक्क से विसाल है!
रोजा अगर नहीं है तो जीना महाल है!
सायम की शान सब को बताते हैं मोमिनों!
तुम को रफीक आका उठाते हैं मोमिनों!!
चेहरा भी रोजा दारों का पुरनूर क्यूँ न हो!
हर एक इल्तिजा वहाँ मंजूर क्यूँ न हो!
सर अपना देखो दिल से झुकाते हैं मोमिनों!
तुम को रफीक आका उठाते हैं मोमिनो!!
गुजरा जो वक्त अपना तो फिर आयेगा नहीं!
पछताने से अये दोस्तो फिर फाइदा नहीं!
इस वास्ते सभी को जगाते हैं मोमिनों!
तुम को रफीक आका उठाते हैं मोमिनों!!
हो जायेगी अजाँ अभी गफलत न तुम करो!
मूँह हाथ धो के जल्दी से सहरी अदा करो!
जल्वा सहर का सब को दिखाते हैं मोमिनों!
तुम को रफीक आका उठाते हैं मोमिनों!!
ऐ मोमिनो ये माहे मुनव्वर की रात है!
आका रफीक और ये गौहर की बात है!
हर वक्त बे खुदी को मिटाते हैं मोमिनों!
तुमको रफीक आका उठाते हैं मोमिनें!!
जाहिल है बदनसीब है रोजा नहीं रखा!
`दावर` मैं क्या करूँ मेरी इतनी है इल्तिजा!
पूरा महिना देखिये आते हैं मोमिनो!
तुमको रफीक आका उठाते हैं मोमिनो!!