ये झूठी नगरी ये झूठा गुलशन यहाँ सदा आशियाँ नहीं है
ऐ अक़्ल वालों ज़रा संभलो यहाँ पे जो है वहाँ नहीं है
बचा नहीं है कोई जहाँ में मुसीबतें हैं सभी को घेरी
नहीं है ऐसी ज़मीन कोई बता कहाँ आसमाँ नहीं है
कोई थे इस में महल बनाकर गुज़ारे दिन कोई जंगलों में
ये सारे मर कर गए जहाँ से किसी का इन में निशाँ नहीं है
यहाँ के जीने को ख़्वाब जानो मेरे कहे को बुरा न मानो
किसी को क़ायम नहीं ये नगरी किसी का क़ायम जहाँ नहीं है
कोई भी गुलशन नहीं है ऐसा कि जिस में हर दम बहार होगी
बहार-ए-गुलशन भी कह रही है बत बताही कहाँ नहीं है
उम्मीद सदियों की करने वालों तुम्हें तो कल की ख़बर नहीं है
जो पालता है ये कल जहाँ को उसी का कोई मकाँ नहीं है
न ख़त्म होगी ये ता क़यामत दराज़ बेहद दराज़ है ये
अज़ल से दावर कहो अबद तक हक़ीक़त उसकी बयाँ नहीं है