तबियत अब अपनी संभलती नहीं है
किसी अंजुमन में बहलती नहीं है
है दिल एक मसकन सभी हसरतों का
तमन्ना कोई भी निकलती नहीं है
ख़ुदा जाने उल्फ़त को क्या हो गया है
ये कमबख़्त करवट बदलती नहीं है
है वहशत मेरी सिर्फ़ तन्हाइयों में
गुलिस्तां में जाकर टहलती नहीं है
बहुत समझाया है मैंने ज़िंदगानी को
मेरे साथ हो कर वो चलती नहीं है
पतंगों का अंजाम क्यों है अभी से
सर-ए-शाम शमा तो जलती नहीं है
नहीं मौत को कोई मिलता है दावर
ये किसी ने कहा हाथ मिलती नहीं है