मुझस्सम नूर शमा हैं मेरे महबूब सुब्हानी
वो पर्दा हो के ज़िंदा हैं मेरे महबूब सुब्हानी
ख़ुदाई नाज़ करती है जनाब-ए-गौस-ए-आज़म पर
मुहम्मद का इरादा हैं मेरे महबूब-ए-सुब्हानी
मुहम्मद मुस्तफ़ा की आल से पैदा हुए हैं वो
के वो नूर सरापा हैं मेरे महबूब-ए-सुब्हानी
शब-ए-मेराज में गौस-उल-वरा मौजूद रहकर के
चढ़ाए देके कांधा हैं मेरे महबूब-ए-सुब्हानी
अरब में दीन फैलाए मुहम्मद मुस्तफ़ा पहले
हमें बतलाए आका हैं मेरे महबूब-ए-सुब्हानी
जनाब-ए-गौस को जाहिद जुदा क्यों कर समझते हो
के वो भी नूर-ए-मौला हैं मेरे महबूब-ए-सुब्हानी
ग़यास-उद-दीन हैं दावर शाह-ए-बग़दाद जिलानी
ग़ुलामों पर वो शैदा हैं मेरे महबूब सुब्हानी