हैं माशूक-ए-रहमान मेरे गौस-ए-आज़म
वो वलियों के सुल्तान मेरे गौस-ए-आज़म
कहे क़ुम बा इज़्नी तो मुर्दे उठे हैं
मुहीउद्दीन जिलान मेरे गौस-ए-आज़म
लिए दोश पर मुस्तफ़ा के क़दम को
विलायत है ज़ीशान मेरे गौस-ए-आज़म
अल-इंसान सीरी जो क़ौल-ए-ख़ुदा है
अना सीरी इंसान मेरे गौस-ए-आज़म
ख़ुदा से निराली ख़ुदाई है इनकी
वो ख़ालिक-ए-यज़दान मेरे गौस-ए-आज़म
फ़रिश्ते भी हम्द-ओ-सना में हैं इनकी
हैं महबूब-ए-सुब्हान मेरे गौस-ए-आज़म
सदा बे-नियाज़ इनको दावर है देखा
जो हैं गौस-ए-समदान मेरे गौस-ए-आज़म