65. या अली

 

 

शहरे-आलम मुस्तफ़ा और दरवाज़ा अली

अबू तुराब उनका लक़ब और है क्या क्या अली

 

हैं अली शेरे ख़ुदा भी और हैं मुश्किल कुशा

हैं अली दस्ते यदुल्लाह और वज्हुल्लाह अली

 

आपके फ़ज़लो करम से दीन ज़िंदा हो गया

शुक्रिया सद शुक्रिया आपका है या अली

 

देखलो मन कुन्तु मौला कह दिए हैं मुस्तफ़ा

मैं रहा हूँ जिनका मौला उनके हैं मौला अली

 

जो अली के दोस्त होंगे वो वली बन जाएंगे

आपके दामन को जिसने भी यहाँ थामा अली

 

आपका नामे मुबारक दिल पे मेरे नक़्श है

मैं पिया हूँ आप ही के नाम का प्याला अली

 

आपके रुतबे को दावर जान कर पहचान कर

जानो ईमान से हुआ है आप पे शैदा अली

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