52. इल्तिजा

 

 

कभी अपने दर पर मुझे भी बुलाना

जबीं के लिए है तेरा आस्ताना

 

यूँ ही दूर कब तक रहूँ मेरे आका

दयार-ए-मदीना मुझे भी दिखाना

 

नज़र बंद की तो मदीने में पहुँचूँ

तसव्वुर निगाहों में आका जमाना

 

तुम्हें साक़ी हौज़-ए-कौसर हो आका

मुझे अपने हाथों से वहदत पिलाना

 

हूँ मुश्ताक-ए-दीदार मैं मुद्दतों से

ज़रा मेरी आँखों को जलवा दिखाना

 

जबीं-ए-मोहब्बत कही जा रही है

सलामत रहे आपका आस्ताना

 

ये दूरी कहाँ तक कि दावर सहेंगे

नबी आप दीदार अपना दिखाना

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