41. या रब्बी सल्लू अलैहि व सल्लम

 

 

अल्लाह हुमा सल्ले अला मुहम्मद या रब्बी सल्लू अलैहि व सल्लम

कश्फ़दो जह नूर अल-हुदा मुहम्मद या रब्बी सल्लू अलैहि व सल्लम

 

जैसे मुहम्मद वैसा खुदा है एक इरादा दोनों का है

अंता अना जो कहा मुहम्मद या रब्बी सल्लू अलैहि व सल्लम

 

शक्ल-ए-खुदा है शक्ल-ए-मुहम्मद एक अहद है दूसरा अहमद

साया नहीं आपका या मुहम्मद या रब्बी सल्लू अलैहि व सल्लम

 

जिन्न-ओ-मलाइक हूर-ओ-गुलामा भेज रहे हैं उन पर दुरूदां

जो हैं शाह-ए-अनबिया मुहम्मद या रब्बी सल्लू अलैहि व सल्लम

 

आप ज़माने में जब आए सारे बुतां गिर कर शर्माए

कंकर भी कलमा पढ़ा मुहम्मद या रब्बी सल्लू अलैहि व सल्लम

 

आप से रोशन है जग सारा नूर से अपने है ये उजाला

हर दिल को रोशन किया मुहम्मद या रब्बी सल्लू अलैहि व सल्लम

 

आप मेहरबान बन कर आए आकर के हम सब को बचाए

रोशन ये दिल हो गया मुहम्मद या रब्बी सल्लू अलैहि व सल्लम

 

क्या क्या आप इशारे दिए हैं चांद के टुकड़े आप किए हैं

मरहबा सद मरहबा मुहम्मद या रब्बी सल्लू अलैहि व सल्लम

 

दावर कुन फया कुन कहते हैं मुर्दा दिल ज़िंदा होते हैं

कोनैन तुम पर फिदा मुहम्मद या रब्बी सल्लू अलैहि व सल्लम

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