गंवारे में सल्ले अला झूलते थे हमारे रसूल खुदा झूलते थे
बड़े नाज़ से अंबिया झूलते थे हमारे रसूल खुदा झूलते थे
अर्श से उतारा था झूला खुदा ने तो झूले हैं उस में शाह अंबिया ने
के आराम से मुस्तफ़ा झूलते थे हमारे रसूल खुदा झूलते थे
मुज़म्मिल की डोरी और ताहा का झूला तबारक का तकिया था यहीं बिस्तर
तो ताहा के झूले में शाह झूलते थे हमारे रसूल खुदा झूलते थे
ना साया ज़मीं पर पड़ा ज़िंदगी में है इस्लाम ज़िंदा इसी रोशनी में
वो आख़ा-ए-नूर-उल-हुदा झूलते थे हमारे रसूल खुदा झूलते थे
हमें जिसने शिर्क-ओ-कुफ्र से बचाया वो राह-ए-खुदा पर हमें हैं चलाया
ये झूले में वो रहनुमा झूलते थे हमारे रसूल खुदा झूलते थे
ये झूले का झूला है नात-ए-मुहम्मद ये लोरी की लोरी सुना-ए-मुहम्मद
ये झूले में वो पेशवा झूलते थे हमारे रसूल खुदा झूलते थे
हलीमा ने बचपन में जिन को झुलाया वही पेशवा ने ही कलमा पढ़ाया
वो दावर के भी साक़ी झूलते थे हमारे रसूल खुदा झूलते थे