34. उठाए मुहम्मद को दाई हलीमा

 

 

मज़म्मिल की डोरी का झूला बना कर झुलाए मुहम्मद को दाई हलीमा

सदा हम्द मौला की लोरी सुना कर सुलाए मुहम्मद को दाई हलीमा

 

यतीमी का एहसास होने न देकर किए परवरिश वो हमारे नबी की

जता कर के ममता भुलाए यतीमी हंसाए मुहम्मद को दाई हलीमा

 

मेरे मुस्तफ़ा के लड़कपन के दिन थे वो बच्चों की सोहबत में खेलते थे

फ़रिश्ते ने चीरा था लेटा के सीना उठाए मुहम्मद को दाई हलीमा

 

ख़ुदा की कसम है हलीमा से बढ़कर कोई और दाई जहां में नहीं है

बना कर बिछौना वो गोदी में अपनी सुलाए मुहम्मद को दाई हलीमा

 

कलेजे से अपने लगा के नबी को वो पाले हैं बचपन में जान-ओ-जतन से

कभी दुश्मनों की नज़र में न लाए बचाए मुहम्मद को दाई हलीमा

 

इबादत समझ कर के ख़िदमत किए वो ये हैं दो जहां की शफ़ाअत के बाइस

अमानत नबुवत की उन्होंने संभाली संभाले मुहम्मद को दाई हलीमा

 

बड़ी ख़ुश नसीबी हलीमा की दावर वो रहमत-ए-आलम की दाई बनी हैं

मेरी भी शफ़ाअत करो या मुहम्मद सुनाए मुहम्मद को दाई हलीमा

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