30. इब्तिदा

 

 

ये मुअम्मा नहीं है तो फिर और क्या इब्तिदा कौन है इंतिहा कौन है

अर्श पर भी वही फ़र्श पर भी वही मुस्तफ़ा के सिवा दूसरा कौन है

 

आप अपनी ही सूरत पे शैदा हुआ खुद ही आदम बना कर वो ज़ाहिर हुआ

एक ही शक्ल है अब्द-ओ-माबूद की आईना कौन है देखता कौन है

 

शौक-ए-दीदार हद से जो बढ़ता गया पास बुलवाया महबूब को मेराज में

इस तरफ भी वही उस तरफ भी वही मुद्दई कौन है मुद्दुवा कौन है

 

सिलसिला गुफ्तगू का जो चलने लगा एक आवाज़ थी एक ही ढंग था

सब फ़रिश्ते ये आपस में कहने लगे पूछता कौन है बोलता कौन है

 

आखिरश राज़ गंज ख़फ़ी खुल गया एक इरादा था फ़ैकुन से ज़ाहिर हुआ

अहद-ओ-अहमद में एक मीम बातिन रहा ज़ाहिरा कौन है और छुपा कौन है

 

नह्नु अकरब की आवाज़ रोज़-ए-अज़ल किसी की क़िस्मत में थी कौन था जानता

आरिफ़ों पर ही इरफ़ान ज़ाहिर हुआ कौन आदम बना और बसा कौन है

 

अपने आख़ा से दावर ने पूछा कभी राज़ को राज़ रखा तो क्या फ़ायदा

तो ये आख़ा ने दावर को समझा दिया मुस्तफ़ा कौन है और ख़ुदा कौन है

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