18. सुल्तान मैं हूँ

 

 

ख़ुदा की हस्ती का उन्वान मैं हूँ कोई क्या जाने

सदा ही बोलता क़ुरान मैं हूँ कोई क्या जाने

 

फ़रिश्ते और मलाएक मेरी हस्ती को किये सजदा

यक़ीनन नाइब-ए-रहमान मैं हूँ कोई क्या जाने

 

ख़ुदा ने अपनी सूरत पर बनाया है मेरी सूरत

हक़ीक़त सूरत-ए-रहमान मैं हूँ कोई क्या जाने

 

ख़ुदा है राज़दां मेरा ख़ुदा का राज़दां मैं हूँ

बड़ा सिर्री भरा इंसान मैं हूँ कोई क्या जाने

 

ख़ुदा को नाज़ है हर दम बनाया यार वो अपना

वो मेरी जान उसकी शान मैं हूँ कोई क्या जाने

 

मेरी हस्ती के अंदर देखलो सारी ख़ुदाई है

ख़ुदा-ए-पाक का दीवान मैं हूँ कोई क्या जाने

 

बरोज़-ए-हश्र मैं दावर भी मस्जूद-ए-मलाएक है

फ़रिश्तों का वहाँ सुल्तान मैं हूँ कोई क्या जाने

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