15. खुदा मेरे साथ है

 

 

क्यू लूं वसीला गैर का ये कैसी बात है

रोशन किताब साथ है राह-ए-निजात है

 

शह रग से दूर तो नहीं मौलाए कायनात

दिल को बना के घर मेरा रब मेरे साथ है

 

ठंडक नमाज़ आँखों की मेराज है मेरी

अहमद अहद है सामने शब-ए-बरात है

 

आखा तो सामने मेरे रहता है हर घड़ी

मुझ को गरज उसी से बका जिस की जात है

 

सरकार-ए-मुस्तफा का वसीला हे लाज़मी

रहबर नहीं तो बंदे को शैतान की घात है

 

कामिल यहाँ पे मिलना तो दुश्वार है बहुत

आसान है रब को पाना मुश्किल भी बात है

 

दावर को ज़िंदगी है लगी ख्वाब की तरह

जिंदा हूँ ता हश्र में खुदा मेरे साथ है

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