ख़ुदा को राज़ी कर लेना मना लेना इबादत है
उसी की याद में आँसू बहा लेना इबादत है
परस्तिश आखा व माबूद की पक्की शरीअत है
ये दोनों की मोहब्बत को कमा लेना इबादत है
विसाल-ए-यार की हसरत तमन्ना क़ुर्ब-ए-मौला की
इन्हें को क़ल्ब के अंदर समा लेना इबादत है
ख़ुदा-ए-पाक का हरदम तसव्वुर सामने रख कर
ज़माना भूल कर सर को झुका लेना इबादत है
तवाफ़-ए-ख़ाना काबा के खातिर लोग जाते हैं
हमारे पास काबा को बुला लेना इबादत है
क्या बे इंतिहा सज्दे मगर शैतान क्या पाया
रियाकारी से अपने को बचा लेना इबादत है
नहीं बहका सकेगा आपको ये नफ़्स ऐ दावर
फ़रेब-ए-नफ़्स से ख़ुद को बचा लेना इबादत है