इब्तिदा मंदान अव्वल रम्ज़ बिस्मिल्लाह हुआ
ख़ाक के पुतले में रौशन नूर नूर अल्लाह हुआ
क़लमे की कुल में निहां है पोशीदा दोनों जहाँ
ला इलाहा से है यहाँ आदम सफ़ी अल्लाह हुआ
ला इलाहा का राज़ ज़ाहिर देख ले हर एक वजूद
रहनुमा हादी मोहम्मद ये रसूल अल्लाह हुआ
रब को गर है देखना तो मुस्तफ़ा को देख लो
ज़ाहिर ओ बातिन बक़ा हम को हबीब अल्लाह हुआ
अव्वल ओ आख़िर वही और ज़ाहिर ओ बातिन वही
रम्ज़-ए-इरफ़ां पाने यारो वो बक़ा बा अल्लाह हुआ
आरिफ़ों और आशिक़ों को दम-ब-दम दीदार है
ज़ाहिर ओ बातिन तमामी शै से वज्ह अल्लाह हुआ
देख लो मेरे नबी का न बाप न बेटा कोई
ज़ाहिरां अंधों ने देखा बाप अब्दुल्लाह हुआ
रू अहमद और मोहम्मद और है महमूद-ए-हक़
मेरे आक़ा की ज़ुबां से बा कलाम अल्लाह हुआ
मन अरफ़ा और क़द अरफ़ा में दो जहाँ की सैर है
पाने रम्ज़ अपना मुनव्वर ख़ुद फ़ना फ़ि अल्लाह हुआ