मेरी फरियाद सुन अये मेरे मेहरबाँ!
छोड़ कर जाऊँगा तेरा दर मैं कहाँ!!
तेरे दर का गदा हूँ भिकारी हूँ मैं!
तेरा बन्दा ही अये रब्बे बारी हूँ मैं!!
तू है मालिक तू ही शाहा मैं हूँ फकीर!
भीक दे अपने दर की अये रब्बे कदीर!!
करदे हम पर करम अये शहे दो जहाँ!
दूर करदे दिलों से हमारे गुमाँ!!
कुपर से शिर्क से तू बचाले हमें!
अपनी वहदत के दे तू उजाले हमें!!
फँस गये हैं गुरूर व हसद में भी हम!
तेरी रहमत् का हो जाये मौला करम!!
नफ्स के जाल से हम को तू दूर कर!
सामने हर अदू के न मजबूर कर!!
हाथ में हम को शमशीर उरियाँ तू दे!
सबर का अपने हाथों में दामाँ तू दे!!
हम तो गाफिल हुए हैं तेरे याद से!
सो गये हैं यहाँ अपनी फरीयाद से!!
आग उलफत की दिल में तू ऐसी लगा!
मुर्दा दिल को हमारे तू आका जगा!!
हर मुसीबत से रँज अलम् से बचा!
दीने अहमद की उल्फत् को दिल में बढ़ा!!
करदे आसान सब मुशकिलों को यहाँ!
सुन हमारी सदा मालिके दो जहाँ!!
माफ करदे खता और तकसीर को!
करदे बरतर हमारी तू तकदीर को!!
पुख्तगी दे हमारे तू ईमाँ को!
हम न भुलें कभी तेरे फरमाँ को!!
कबर में कर अता रोशनी नूर की!
दाग लगने न पाये कफ़न को कभी!!
रहम कर हमपे कहते हैं तुझको रहीम!
हो करम हम पे तेरा के तू है करीम!!
है रफीकी ये दावर तेरा ही गुलाम!
गँजे गोहर का साया रहे बस् मुदाम!!