118. नफ्स हमारा गुलाम है

 

 

अये यार ये भी कितना हसीं अहतीमाम है!

सजदे में कोई है तो किसी का कयाम है!!

 

इलहाम वो आगही नहीं सब के नसीब में!

इस की तरफ से खास अता और पयाम है!!

 

दिवाने गाने इश्क को समझा नहीं कोई!

उन को समझना बस् किसी आशिक का काम है!!

 

कमजर्फ की गुलामी करें और हम नदीम!

कहते हैं जिस को नफ्स हमारा गुलाम है!!

 

लाहूत में जो पहुँचा वो इन्नी अना हुआ!

तू जानता है शेख ये कैसा मुकाम है!!

 

माँगे थे आग और मिली है पयंबरी!

सरशार है वहाँ तो कोई तिश्न काम है!!

 

बिन् देखे सजदा करते हैं पढ़ते हैं जो नमाज!

उन अहले दीन को दूर से दावर सलाम है!!

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