हकीकत आशना होंगे तो अफसानों का क्या होगा!
जलेगी शम्मा महफिल में तो परवानों का क्या होगा!!
यूँ नहीं तुम फेर लोगे मूँह को अपने बजम से उठ कर!
कभी ये भी नहीं सोचा कि दीवानों का क्या होगा!!
न देखो इस तरह हम को बदल कर आँखें महफिल में!
हमारे दिल में हैं जितने वो अरमानों का क्या होगा!!
तमन्ना आरजू हसरत मुरादें मुदुआ अरमाँ!
अगर तुम रूठ जाओगे तो मेहमानों का क्या होगा!!
तुम्हारे वासते हम ने सजाकर रख दिया घर को!
ना देखोगे जो खुद को आईना खानों का क्या होगा!!
तुम्हारा आसरा पाकर संभाले हैं खुदी अपनी!
तुम्हारा फैज न मिलता तो दिवानों का क्या होगा!!
बहक ही जायेंगे वाअिज की फितना साज बातों से!
न समझाओगे तुम दावर तो नादानों का क्या होगा!!