भूलेंगे रास्ता न तेरे जलवा गाह का!
दर से तेरे मिला है पता सीधी राह का!!
तू ला दिखा के कह दिया मुझ को इला भी!
मतलब समझ में आगया अब ला – इलाह- का!!
कान्धों पे लेके फिरते हो हर कूचा हर दयार!
जाहिद् तुम्हारे सर पे है बिस्तर गुनाह का!!
सीमें लिबास को भी वो रुतबा नहीं नसीब!
जो मरतबा है शेख लिबासे सियाह का!!
बाबे कबूल तक है रसाई गुलाम की!
तासीर से है रिश्ता दुआओं का आह का!!
औरों पे तेरा लाख करम है तो क्या हुआ!
मैं मुन्तज़र हूँ बजम में तेरी निगाह का!!
ऐजाज़ मेरे वासते दावर ये कम नहीं!
अदना मैं एक गुलाम हूँ आलम पनाह का!!