82. सजाये गुनाह मिलती है

 

 

मुकामे दिल को जो पहुँचो तो राह मिलती है!

के एक हसीना की वो जल्वगाह मिलती है!!

 

हुजूरे दिल पे जरा देके देखो तुम आवाज!

के परदा दार से फौरन् निगाह मिलती है!!

 

अता हुई है जवानी भी हुस्न युसूफ से!

के एक बूढी जुलेखा को चाह मिलती है!!

 

उलटना पड़ता है आशिक को सैंकड़ों चिलमन्!

बड़े नसीब से वो बारगाह मिलती हैं!!

 

असर भी शरम से तासीर दून्ड लेता है!

दरे कबूल से जिस वक्त आह मिलती है!!

 

नमाज वो है रिया का ना दखल हो जिस में!

इसी लिए तो सजाये गुनाह मिलती है!!

 

हर एक दरपे ये बन्दा हुआ है शरमिन्दा!

वो एक दर् है जहाँ पर पनाह मिलती है!!

 

कोई भी दरमियाँ आने ना पाये हजरते दिल!

हमारी आज किसी से निगाह मिलती है!!

 

ये सितम है के बज्मे सुखन् में ऐ  दावर!

हजारों शेअरों पे बस् एक वाह मिलती है!!

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