80. सलाम आया तो क्या

 

 

बाद मुद्दत के भी हाथों में न जाम आया तो क्या!

उन की बज्मे नाज से एक तश्न काम आया तो क्या!!

 

जिस कदर थी फर्ज हम पर हो चुकी पूरी नमाज!

अब हमारे वास्ते इज्न कयाम आया तो क्या!!

 

आग को गुलजार बनते हमने देखा है अभी!

इश्क व उलफत में अगर ऐसा मुकाम आया तो क्या!!

 

दिल की फितरत् है धडकना क्या गर्ज आराम से!

उनकी जानिब से तसल्ली का पयाम आया तो क्या!!

 

फेर दीं हमने निगाहें याद कर के उन्हें!

नामाबर उन का अगर बादे सलाम आया तो क्या!!

 

थी रसाई किस बुलन्दी पर जनूने इश्क की!

होश मन्दों में अगर मेरा भी नाम आया तो क्या!!

 

मैकशी से बाज हम  दावर  ना आयेंगे कभी!

जाहिदों के मूँह तलक आना था हरम आया तो क्या!!

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