67. तेरी बन्दगी नहीं है

 

 

तेरा दिल है कुन्ते कंजन् तुझे कुच्छ कमी नहीं है!

तेरे दिल को तोडना भी कोई दिल लगी नहीं है!!

 

मेरा दिल है एक काबा तेरा दिल सीयाह खाना!

यहाँ रोशानी है जाहिद वहाँ रोशनी नहीं है!!

 

लिया उस ने मुझसे गोहर मेरे दिल से दिल मिला कर!

हुआ जग में ओ मुनव्वर उसे कुच्छ कमी नहीं है!!

 

मेरे दिल में एक सनम् है जिसे करता हूँ मैं सजदा!

मेरी बन्दगी के आगे तेरी बन्दगी नहीं है!!

 

कभी लॉ की सरहदों में तो इल्ला की अनहदों में!

कभी खद् अर्फ में गुम हूँ कोई दिल लगी नहीं है!!

 

बा हुजूरे कल्बे सादिक है नमाज भी अधूरी!

तेरा दिल ही खुद कहेगा ये तो भन्दगी नहीं है!!

 

है रफीक और मुनव्वर मेरे मुर्शदाँ ऐ  दावर!

मुझे मिल गये हैं गोहर् मुझे कुच्छ कमी नहीं है!!

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